बलिया अगस्त क्रांति 1942:अंग्रेज सिपाहियों ने किया लाठीचार्ज तो छात्रों ने किया पथराव

अंग्रेज सिपाहियों ने किया लाठीचार्ज तो छात्रों ने किया पथराव
एनडी राय
बलिया। नौ अगस्त 1942 को शुुरु हुई क्रांति ज्वाला धीरे-धीरे शहर से लेकर ग्रामीण इलाके तक धधकने लगी थी और क्रांति की लहर जोर पकड़ने लगी थी। आजादी के दिवाने किसी तरह अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए आमादा थे तो दूसरी ओर अंग्रेज हुक्मरान भी इसे दबाने के लिए हर तरह के उपाय में जुटे थे। जिले में ज्यों-ज्यों आंदोलन उग्र होता जा रहा था, अंग्रेजों का जुल्म भी बढ़ता जा रहा था। आंदोलन को दबाने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने जिला अधिकारी एवं पुलिस कप्तान को व्यापक अधिकार दे रखे थे।
बलिया से बाहर जा रहे आंदोलन की खबरों से ब्रिटिश हुक्मरान काफी चिंतित थे। जब 12 अगस्त 1942 को विद्यार्थियों को पता चला कि जेल में बंद आजादी के दीवानों को ब्रिटिश सैनिकों द्वारा कड़ी यातनाएं दी जा रही हैं तो उनका गुस्सा फूट पड़ा। शहर के विभिन्न मोहल्लों से विद्यार्थियों का जुलूस ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ नारेबाजी करते हुए रेलवे गेट के पास पहुंच गया। इसकी जानकारी मिलने पर परगना हाकिम मिस्टर ओवैस पुलिस टीम के साथ उन्हें रोकने के लिए रेलवे गेट पहुंचा। यहां ब्रिटिश सैनिकों को देखकर छात्रों का आक्रोश और बढ़ गया और वह जोर जोर से नारेबाजी करने लगे। छात्रों की भीड़ को देखते ही घबराया हुआ परगना हाकिम मिस्टर ओवैस ने लाठीचार्ज का आदेश दे दिया और इसके साथ ही छात्रों पर ब्रिटिश सैनिक टूट पड़े। अंग्रेज सिपाहियों ने छात्रों को बेरहमी के साथ उन्हें सड़कों पर पीटा। यह देख छात्रों ने भी अपने बचाव के लिए पुलिस पर पथराव शुरु कर दिया। इस संघर्ष में दर्जनों छात्र चोटिल हो गए और 30 छात्र गिरफ्तार कर लिए गए। उन्हें पुलिस स्टेशन ले जाकर कठिन यातनाएं दी गई। इसकी सूचना जब ग्रामीण इलाकों में पहुंची तो जगह-जगह जुलूस निकाल कर विरोध जताया गया। बैरिया क्षेत्र के लालगंज ग्राम में रूप नारायण सिंह एवं सुदर्शन सिंह के नेतृत्व में ग्रामीणों ने जुलुस निकाला और अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे से द्वाबा की धरती गूंजने लगी।
